डेंगू 2026: प्लेटलेट्स का भ्रम, नई वैक्सीन और को-इंफ़ेक्शन का ख़तरा
Ashlesha Thakur
बरसात का मौसम अपने साथ कई चुनौतियां लेकर आता है, जिनमें डेंगू का बढ़ता ख़तरा सबसे प्रमुख है. इस साल यानी 2026 में डेंगू के मामलों में तेज़ी के साथ-साथ कई नए मेडिकल ट्रेंड भी देखने को मिल रहे हैं. स्वदेशी वैक्सीन का ट्रायल हो, प्लेटलेट्स को लेकर लोगों का भ्रम हो, या एक साथ दो बीमारियों (Co-infection) का हमला, इन सभी मुद्दों पर सही जानकारी होना बेहद ज़रूरी है.
सीके बिड़ला हॉस्पिटल (CK Birla Hospital), दिल्ली में इंटरनल मेडिसिन के कंसल्टेंट डॉ. अमित प्रकाश सिंह ने डेंगू से जुड़े इन सभी महत्वपूर्ण और गंभीर सवालों के विस्तार से जवाब दिए हैं. आइए, एक विशेषज्ञ की नज़र से समझते हैं डेंगू की वर्तमान स्थिति और बचाव के सही तरीके.
प्लेटलेट्स बनाम हेमाटोक्रिट: क्या है ज़्यादा ख़तरनाक?
डेंगू होने पर ज़्यादातर मरीज़ और उनके परिजन सिर्फ़ प्लेटलेट काउंट (Platelet count) गिरने से पैनिक कर जाते हैं, लेकिन डॉ. सिंह स्पष्ट करते हैं कि सिर्फ़ प्लेटलेट काउंट देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि डेंगू कितना गंभीर है.
मेडिकल नज़रिए से ‘हेमाटोक्रिट’ (PCV) का बढ़ना कहीं ज़्यादा ख़तरनाक हो सकता है. हेमाटोक्रिट बढ़ने का मतलब है कि खून की नसों से प्लाज़्मा बाहर निकल रहा है (Capillary leak). इससे शरीर में सर्कुलेटिंग ब्लड की मात्रा कम हो जाती है और मरीज़ शॉक (Shock) में जा सकता है. इसलिए हर बार प्लेटलेट गिरने पर घबराने या तुरंत प्लेटलेट चढ़ाने की ज़रूरत नहीं होती. डॉक्टर ब्लड प्रेशर, यूरिन आउटपुट और हेमाटोक्रिट को साथ देखकर ही इलाज तय करते हैं.
बुख़ार उतरने के बाद का धोखा और वार्निंग साइन
डेंगू का सबसे बड़ा धोखा यह है कि बुख़ार कम होने को लोग अक्सर ठीक होने का संकेत मान लेते हैं. डॉ. सिंह चेतावनी देते हैं कि बीमारी के तीसरे से सातवें दिन के बीच (ख़ासकर जब बुख़ार उतरता है), मरीज़ पर सबसे ज़्यादा नज़र रखनी चाहिए.
अगर बुख़ार उतरने के बाद ये ‘वार्निंग साइन’ (Warning Signs) दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें:
- तेज़ या लगातार पेट दर्द और बार-बार उल्टी.
- नाक, मसूड़ों या मल (Stool) से खून आना.
- बहुत ज़्यादा कमज़ोरी, बेचैनी या अत्यधिक नींद आना.
- सांस लेने में तकलीफ़ और यूरिन कम होना.
- चक्कर आना या शरीर का ठंडा और चिपचिपा पड़ जाना. इन्हें नज़रअंदाज़ करने से डेंगू शॉक सिंड्रोम (DSS) जैसी जानलेवा स्थिति पैदा हो सकती है.
जलवायु परिवर्तन और कीटनाशकों से बेअसर होते मच्छर
बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) डेंगू फैलाने वाले एडीज़ (Aedes) मच्छरों के लिए अनुकूल माहौल बना रहे हैं. अब मच्छर उन इलाकों में भी पनप रहे हैं, जहां पहले नहीं होते थे.
इसके अलावा, मच्छरों में कीटनाशकों (Insecticides) के ख़िलाफ़ ‘रेज़िस्टेंस’ भी विकसित हो रहा है. डॉ. सिंह के अनुसार, सिर्फ़ म्युनिसिपल फ़ॉगिंग (Fogging) के भरोसे रहना अब पर्याप्त नहीं है. घरों और आसपास जमा पानी को हटाना और लोगों की सीधी भागीदारी (Community participation) ही मच्छरों को कंट्रोल करने का सबसे कारगर तरीका है.
डेंगू 2026 की नई चुनौती: को-इंफ़ेक्शन
इस सीज़न में डेंगू के साथ-साथ मरीज़ों में स्वाइन फ़्लू (H1N1), चिकनगुनिया (Chikungunya) और टाइफ़ाइड के को-इंफेक्शन के मामले भी सामने आ रहे हैं.
डॉ. सिंह बताते हैं कि इन सभी बीमारियों के शुरुआती लक्षण (बुख़ार, सिरदर्द, शरीर में दर्द) एक जैसे होते हैं, जिससे सही पहचान करना मुश्किल हो जाता है. इलाज के दौरान भी चुनौती आती है क्योंकि एक इंफ़ेक्शन में इस्तेमाल होने वाली दवा दूसरे में नुकसान कर सकती है. जैसे, डेंगू में कुछ दर्द निवारक दवाएं (Painkillers) ब्लीडिंग का ख़तरा बढ़ा सकती हैं. इसलिए बिना सही लैब टेस्ट और डॉक्टरी सलाह के कोई भी दवा लेना ख़तरनाक हो सकता है.
घरेलू नुस्खे और लिवर पर उनका ख़तरनाक असर
डेंगू में प्लेटलेट्स तेज़ी से बढ़ाने के भ्रम में लोग पपीते के पत्ते का अत्यधिक रस, गिलोय या अन्य काढ़े का अंधाधुंध सेवन करने लगते हैं.
डॉ. सिंह साफ़ करते हैं कि प्राकृतिक होने का मतलब यह नहीं है कि वह हर मात्रा में सुरक्षित है. बिना डॉक्टरी सलाह के इन चीज़ों का ओवरडोज़ मरीज़ के लिवर (लिवर एंजाइम का बढ़ना) पर ख़राब असर डाल सकता है. डेंगू में शरीर के लिवर एंजाइम पहले से ही बढ़े हुए हो सकते हैं, इसलिए ऐसे अनावश्यक सप्लीमेंट्स, स्थिति को और जटिल बना सकते हैं. किसी भी हर्बल प्रोडक्ट का सेवन करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है.
DengiAll वैक्सीन का ट्रायल और भारत की उम्मीदें
ICMR और Panacea Biotec द्वारा विकसित की जा रही भारत की पहली स्वदेशी ‘DengiAll’ सिंगल-डोज़ वैक्सीन का फ़ेज़-3 क्लिनिकल ट्रायल इस समय अपने अंतिम चरण में है.
डॉ. अमित प्रकाश सिंह का कहना है कि भारत में डेंगू का बहुत बड़ा बोझ है, ऐसे में एक स्वदेशी सिंगल-डोज़ वैक्सीन का विकास एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है. डेंगू के चारों सीरोटाइप (DENV 1-4) के ख़िलाफ़ यह वैक्सीन कितनी कारगर और सुरक्षित है, यह फ़ेज़-3 के अंतिम नतीजों से ही साफ़ हो पाएगा. अगर यह वैक्सीन रेगुलेटरी अप्रूवल पास कर लेती है, तो यह भारत में डेंगू की रोकथाम के लिए एक बड़ा और असरदार हथियार साबित होगी.