• Zindagi With Richa
  • 21 March, 2026
blog-image
Zindagi With Richa

लेखिका- ऋतु भारद्वाज

पिछले कुछ दिनों से एक अजीब सी हलचल है. एलपीजी (LPG) सिलेंडर की किल्लत की खबरें लगातार सुनाई दे रही हैं. कई इलाकों में गैस एजेंसियों के बाहर सुबह से ही लंबी कतारें लग रही हैं. कोई टोकन लेकर खड़ा है, कोई बार-बार एजेंसी के चक्कर लगा रहा है, इस उम्मीद में कि शायद आज सिलेंडर मिल जाए.

सबसे ज़्यादा परेशानी उन लोगों को हो रही है जो रोज़ कमाते हैं और हर दिन की कमाई से उनके घर का चूल्हा जलता है. ऐसे में ब्लैक में मिलने वाले सिलेंडर को खरीदने में उनके महीने भर की कमाई का एक बड़ा हिस्सा चला जाता है.

इसी बीच आज सुबह मेरी मेड आई और आते ही बोली, “दीदी, लगता है गांव ही जाना पड़ेगा… कम से कम वहां लकड़ी और चूल्हा तो मिलेगा. बच्चों को भूखा तो नहीं रहना पड़ेगा.”

उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी… बस एक सीधी-सी सच्चाई थी. और उस एक वाक्य ने मुझे अचानक कुछ साल पीछे पहुंचा दिया… कोविड के उस काले दौर में. जब बड़े-बड़े शहर, जिन्हें हम आधुनिकता और अवसरों का केंद्र कहते थे, अचानक अपने ही लोगों के लिए बेगाने हो गए थे.

लंबी सड़कें… और गांव की ओर लौटते लोग

उस समय टीवी पर, मोबाइल स्क्रीन पर, अख़बारों में, हर जगह एक ही दृश्य दिखाई देता था. लंबी सड़कें… चलते हुए लोग… कंधों पर गठरियां… गोद में बच्चे… और पैरों में छाले.

कोविड-19 महामारी के दौरान मुंबई, पुणे, दिल्ली, गुरुग्राम, सूरत जैसे बड़े शहरों से लाखों लोग निकल पड़े थे. कोई पैदल, कोई साइकिल पर, तो कोई ट्रक के पीछे बैठकर… क्योंकि शहर अचानक बेरहम हो गए थे. ना नौकरी बची थी, ना राशन, ना कोई सहारा. लेकिन उन सभी के पास एक अटूट भरोसा था, “गांव पहुंच जाएंगे तो कुछ न कुछ हो ही जाएगा.”

गांव सिर्फ़ जगह नहीं, एक भरोसा है

कभी आपने सोचा है कि संकट के समय लोगों को सबसे पहले अपना गांव ही क्यों याद आता है?

शहर हमें अवसर देते हैं, पर गांव हमें ‘रिश्ते’ देते हैं. गांव में शायद एसी नहीं होता, बड़े मॉल नहीं होते, चमचमाती सड़कें नहीं होतीं. लेकिन वहां ‘अपने लोग’ होते हैं. गांव में भूख भी अकेली नहीं होती. गांव में कोई भूखा हो, तो यह सिर्फ़ उसका व्यक्तिगत संकट नहीं रहता. यह पूरे समुदाय की चिंता बन जाता है.

शहर की ताकत… या हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी?

आज हम शहरों में रहते हुए ख़ुद को बहुत मज़बूत समझते हैं. हमारे पास सारी सुविधाएं हैं, ऑनलाइन डिलीवरी है, रेस्टोरेंट हैं, क्रेडिट कार्ड और मोबाइल ऐप्स हैं. लेकिन ज़रा ध्यान से देखें तो शहरों में हमारी ज़िंदगी बहुत नाज़ुक धागों पर टिकी है.

ये मुश्किल हालात हम शहर में रहने वालों को सच का एहसास करा देते हैं. अगर सिलेंडर खत्म हो जाए, अगर पानी की सप्लाई रुक जाए या इंटरनेट बंद हो जाए… तो हम अचानक असहाय महसूस करने लगते हैं. और ठीक उसी वक़्त समझ आता है कि हमारी असली जड़ें कहां हैं.

जड़ों से जुड़े लोग कभी सच में अकेले नहीं होते

मेरी मेड शहर में लोगों के घरों में काम करती है. वह रोज़ी-रोटी के लिए हर दिन मेहनत करती है और अपने बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए संघर्ष करती है. लेकिन उसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसकी जड़ें अभी भी गांव में हैं.

उसे पता है कि अगर शहर में कोई बड़ी मुश्किल आ जाए, तो उसके पास एक सुरक्षित जगह है जहां वह वापस जा सकती है. एक ऐसी जगह जहां लोग हैं जो उसे पहचानते हैं. यह भरोसा शायद मेरे जैसे लोगों के पास कम होता जा रहा है, जो रोज़गार की तलाश में शहर आकर बस गए हैं और अपनी जड़ों से कट गए हैं. या वो लोग जो शहरों में ही पैदा हुए और यहीं बड़े हुए हैं.

मेरी मेड की तरह जो लोग अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं, उन्हें पता होता है कि जीवन कभी बहुत कठिन हो भी जाए, तो कहीं न कहीं एक ज़मीन है जहां से फिर से शुरुआत हो सकती है.

शहर हमें आगे बढ़ाते हैं, गांव हमें संभालते हैं

कभी-कभी मैं सोचती हूं कि हम जो शहरों में बस गए हैं, जिनकी पीढ़ियां अब गांव से दूर हो चुकी हैं… हम किस सहारे जी रहे हैं? हमारे पास भौतिक सुविधाएं तो बहुत हैं, लेकिन क्या हमारे पास वह सामूहिक सहारा (Community Support) है जो गांवों में होता है?

शहर बेशक हमें आधुनिक और स्वतंत्र बनाते हैं… लेकिन कभी-कभी भीतर से बहुत अकेला भी कर देते हैं. और शायद इसी वजह से हर कठिन दौर में, लोगों के कदम शहरों से मुड़कर उसी दिशा में चलते हैं, जहां उनकी जड़ें हैं. लोग शहरों से भागते हैं, और गांव की ओर लौटते हैं क्योंकि शहर सिर्फ़ अवसर देते हैं… पर गांव जीवन देते हैं.

मेरी मेड की कही ये बात – “कम से कम वहां लकड़ी और चूल्हा तो मिलेगा” . कितना साधारण वाक्य है यह… लेकिन उसके भीतर छिपा भरोसा असाधारण है. वह भरोसा जो शायद आधुनिक शहरों की सबसे बड़ी कमी बनता जा रहा है. जब दुनिया की सारी व्यवस्थाएं डगमगाने लगती हैं, तो अंत में हमें बचाने के लिए अक्सर वही चीज़ खड़ी रहती है, जिसे हम सबसे साधारण समझते हैं, अपनी जड़ों का भरोसा.

अंत में बस यही कहूंगी कि शहर हमें आगे बढ़ाते हैं… लेकिन गांव हमें बचाए रखते हैं.

Comments

Write Your Comment