• Zindagi With Richa
  • 07 November, 2026
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दिवाली में जलने पर क्या करें? डॉक्टर से जानें 8 क्लिनिकल उपाय

Ashlesha Thakur

दिवाली रोशनी और ख़ुशियों का त्योहार है, लेकिन ज़रा सी चूक इस जश्न को गंभीर हादसे में बदल सकती है. दीयों, पटाखों या रसोई में गर्म तेल से जलने के मामले इस दौरान बहुत आम हो जाते हैं. अक्सर सही जानकारी के अभाव में लोग जले हुए घाव पर बर्फ़, टूथपेस्ट या घी लगा लेते हैं, जो स्थिति को सुधारने के बजाय और बिगाड़ देता है. इसके अलावा, पटाखों का ज़हरीला धुआं भी शरीर को अंदरूनी नुक़सान पहुंचाता है.

दिवाली के दौरान जलने (Burns) की स्थिति में सही फ़र्स्ट-एड क्या होना चाहिए और क्लिनिकल देखभाल कैसे की जानी चाहिए, इसे लेकर सीके बिड़ला हॉस्पिटल®, दिल्ली के विशेषज्ञों— डॉ. अमित प्रकाश सिंह (कंसल्टेंट – इंटरनल मेडिसिन) और डॉ. तन्वी गुप्ता अरोड़ा (कंसल्टेंट – डर्मेटोलॉजी) ने कुछ बेहद अहम और वैज्ञानिक उपाय साझा किए हैं.

1. शुरुआती मिनटों का फ़र्स्ट-एड: पानी बनाम टूथपेस्ट

डॉ. तन्वी गुप्ता के अनुसार, जलने के बाद शुरुआती कुछ मिनट बेहद अहम होते हैं. रसोई में गर्म तेल या पानी से जलने पर प्रभावित हिस्से को तुरंत 20 मिनट तक ठंडे बहते पानी (Running Water) के नीचे रखें. कपड़े या गहने हटा दें, लेकिन अगर कोई कपड़ा त्वचा से चिपक गया है, तो उसे बिलकुल न खींचें. घाव पर बर्फ़, टूथपेस्ट, घी या तेल लगाने से सख़्ती से बचें, क्योंकि बर्फ़ से ‘फ़्रॉस्टबाइट’ हो सकता है और टूथपेस्ट संक्रमण (Infection) का ख़तरा बढ़ा देता है.

2. पटाखों से केमिकल बर्न: एक अलग चुनौती

आम ‘थर्मल बर्न’ की तुलना में पटाखों से जलना ज़्यादा ख़तरनाक होता है, क्योंकि इसमें गर्मी के साथ-साथ बारूद और केमिकल के कण भी त्वचा में चले जाते हैं. ऐसे मामलों में, अगर त्वचा पर सूखे केमिकल के कण लगे हैं, तो पहले उन्हें हल्के हाथ से झाड़ दें. इसके बाद हिस्से को 20 मिनट तक पानी से धोएं. केमिकल को बेअसर करने के लिए अपनी मर्ज़ी से कोई दूसरी चीज़ न लगाएं, क्योंकि इससे त्वचा पर उल्टा रिएक्शन हो सकता है.

3. छालों (Blisters) को भूलकर भी न फोड़ें

जलने की गंभीरता को समझना बहुत ज़रूरी है. फ़र्स्ट-डिग्री बर्न में त्वचा लाल होती है और दर्द होता है. सेकंड-डिग्री में त्वचा पर छाले (Blisters) पड़ जाते हैं. वहीं, थर्ड-डिग्री बर्न में त्वचा सफ़ेद या चमड़े जैसी काली पड़ जाती है और नसों के जल जाने के कारण इसमें दर्द तक महसूस नहीं होता. विशेषज्ञों की सख़्त हिदायत है कि जले हुए हिस्से पर बने छालों को कभी नहीं फोड़ना चाहिए. छाले के अंदर का पानी घाव को संक्रमण से बचाता है. इसे फोड़ने से घाव गहरा हो सकता है और निशान पड़ सकते हैं.

4. ख़ामोश लेकिन जानलेवा: ‘एयरवे बर्न’

पटाखों का धुआं सिर्फ़ सांस फूलने का कारण नहीं बनता, बल्कि यह ‘एयरवे बर्न’ (सांस की नली का जलना) का कारण भी बन सकता है. डॉ. अमित प्रकाश सिंह बताते हैं कि लगातार खांसी, आवाज़ बैठना, गले में जलन, सांस में घरघराहट, सीने में जकड़न, नाक के बालों का जलना या मुंह के आसपास कालिख दिखना ख़तरे के बड़े संकेत हैं. अगर मरीज़ को चक्कर या भ्रम हो, तो उसे तुरंत इमरजेंसी में ले जाएं, क्योंकि सांस की नली में सूजन तेज़ी से बढ़कर जानलेवा हो सकती है.

5. बड़ा हिस्सा जलने पर ‘शॉक’ और पानी की कमी

शरीर का बड़ा हिस्सा जलने पर त्वचा से ज़रूरी तरल पदार्थ तेज़ी से निकल जाते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर गिरने (Shock) और डिहाइड्रेशन का ख़तरा रहता है. ऐसी स्थिति में तुरंत एम्बुलेंस बुलाएं. मरीज़ को साफ़ और सूखे कपड़े से ढककर गर्म रखें. अगर मरीज़ बेहोश है, तो उसे कुछ भी खाने-पीने को न दें. अस्पताल पहुंचने पर ही ड्रिप के ज़रिए तरल पदार्थ दिए जाने चाहिए.

6. टिटनेस और एंटीबायोटिक्स का सही इस्तेमाल

जलने पर त्वचा की सुरक्षा परत टूट जाती है, जिससे सेप्सिस (Sepsis) का ख़तरा बढ़ जाता है. हर जले हुए घाव के लिए टिटनेस का टीका या इम्युनोग्लोबुलिन ज़रूरी होता है, जो मरीज़ की मेडिकल हिस्ट्री पर निर्भर करता है. हालांकि, हर मरीज़ को तुरंत एंटीबायोटिक्स नहीं दी जातीं, डॉक्टर संक्रमण के लक्षण दिखने पर ही इसे शुरू करते हैं.

7. डायबिटीज़ और बुज़ुर्ग मरीज़ों के लिए विशेष देखभाल

डायबिटीज़ के मरीज़ों और बुज़ुर्गों में रिकवरी बहुत धीमी होती है. डायबिटीज़ में न्यूरोपैथी (नसों का सुन्न होना) के कारण अक्सर मरीज़ को घाव की गहराई या दर्द का एहसास नहीं होता. ऐसे में ब्लड शुगर को सख़्ती से नियंत्रित रखना और घाव की नियमित ड्रेसिंग करवाना बेहद ज़रूरी है, ताकि संक्रमण को फैलने से रोका जा सके.

8. त्वचा के काले दागों (Hyperpigmentation) से बचाव

घाव भरने के बाद त्वचा पर गहरे काले दाग रह जाना एक आम समस्या है. डॉ. तन्वी के अनुसार, यह सूजन और मेलेनिन का उत्पादन बढ़ने के कारण होता है. इससे बचने के लिए नई त्वचा आने पर उस पर रोज़ाना SPF 30–50 वाला ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन लगाएं और सीधे धूप में जाने से बचें. निशान ज़्यादा गहरे हों, तो डर्मेटोलॉजिस्ट की सलाह से सिलिकॉन जेल, केमिकल पील या लेज़र ट्रीटमेंट का सहारा लिया जा सकता है.

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