रेबीज़ 100% जानलेवा क्यों है? भूलकर भी न करें ये ग़लतियां, जानें सही इलाज
Ashlesha Thakur
मेडिकल साइंस ने आज भले ही कितनी भी तरक्की कर ली हो, लेकिन रेबीज़ (Rabies) आज भी दुनिया की सबसे ख़तरनाक और जानलेवा बीमारियों में से एक है. यह एक ऐसा संक्रमण है जिसके लक्षण दिखने के बाद मरीज़ को बचाना लगभग नामुमकिन हो जाता है. भारत में आवारा कुत्तों की भारी तादाद और जागरूकता की कमी के कारण, यह आज भी एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है.
आखिर रेबीज़ 100% जानलेवा क्यों है? कुत्ते के काटने पर सही फ़र्स्ट-एड (First-Aid) क्या होना चाहिए? और वैक्सीन लेने में देरी क्यों नहीं करनी चाहिए? इन सभी अहम सवालों के जवाब हमने जाने सीके बिरला हॉस्पिटल, दिल्ली की डायरेक्टर (इंटरनल मेडिसिन), डॉ. मनीषा अरोड़ा से.
रेबीज़ 100% जानलेवा बीमारी क्यों है?
डॉ. मनीषा बताती हैं कि एक बार जब रेबीज़ का वायरस शरीर में जाकर नसों के रास्ते दिमाग तक पहुंच जाता है, तो फिर इसे रोकना असंभव हो जाता है. हमारे दिमाग के आसपास ‘ब्लड-ब्रेन बैरियर’ नाम की एक सुरक्षा परत होती है, जिसकी वजह से दवाइयां वहां आसानी से असर नहीं कर पातीं.
लक्षण दिखने का सीधा मतलब है कि वायरस दिमाग तक पहुंच चुका है, और इस स्टेज पर बीमारी बहुत तेज़ी से बिगड़ती है. यही कारण है कि पूरी दुनिया में रेबीज़ के इलाज से ज़्यादा ज़ोर इसकी ‘रोकथाम’ (Prevention) पर दिया जाता है.
सबसे पहली ग़लती: घरेलू नुस्खे अपनाना
अक्सर लोग कुत्ते के काटने पर घबरा जाते हैं और घाव पर हल्दी, मिर्च, मिट्टी, तेल या चूना लगाने लगते हैं. डॉ. अरोड़ा के अनुसार, यह बहुत ख़तरनाक हो सकता है. इससे वायरस घाव के अंदर फंसा रह सकता है और इंफ़ेक्शन तेज़ी से फैल सकता है.
क्या है सही फ़र्स्ट-एड? कुत्ते के काटने के तुरंत बाद सबसे पहला और ज़रूरी काम है घाव को बहते पानी और साबुन से 15 से 20 मिनट तक अच्छे से धोना. साबुन वायरस की बाहरी परत को नुकसान पहुंचाता है और बहता पानी उसे घाव से बाहर निकाल देता है. घाव को दबाना, काटना या कसकर पट्टी बांधना भी ख़तरनाक है. इसे खुला रखना बेहतर होता है.
‘मामूली खरोंच है’ या ‘पालतू कुत्ता है’ – ये भ्रम जानलेवा हैं
रेबीज़ सिर्फ़ गहरे काटने से ही नहीं फैलता. त्वचा पर हल्का सा कट, नाखून की खरोंच, या खुले घाव पर कुत्ते के चाटने से भी वायरस शरीर में जा सकता है. यहां तक कि आंख, नाक या मुंह के संपर्क से भी ख़तरा हो सकता है.
लोग अक्सर सोचते हैं कि पालतू कुत्ते ने काटा है, तो डरने की बात नहीं है. लेकिन यह सोच सुरक्षित नहीं है. अगर कुत्ते का वैक्सीनेशन रिकॉर्ड पक्का नहीं है या उसके व्यवहार में बदलाव दिख रहा है, तो जोखिम न लें. तुरंत डॉक्टर की सलाह से वैक्सीन ज़रूर लगवाएं.
वैक्सीन का सही कोर्स: ARV और RIG
एंटी-रेबीज़ वैक्सीन (ARV) शरीर को वायरस के ख़िलाफ़ एंटीबॉडी बनाने में मदद करती है. इसका आम शेड्यूल दिन 0, 3, 7, 14 और 28 होता है.
अगर घाव ज़्यादा गहरा है, खून निकल रहा है, या चेहरे/गर्दन के पास काटा गया है, तो डॉक्टर ‘रेबीज़ इम्यूनोग्लोबुलिन’ (RIG) भी देते हैं. RIG तैयार एंटीबॉडी की तरह काम करता है और तुरंत सुरक्षा देता है. पूरा कोर्स ख़त्म करना बेहद ज़रूरी है, बीच में डोज़ छोड़ने से सुरक्षा नहीं मिलती.
देरी और ’10 दिन का इंतज़ार’ वाली ग़लती
कुछ लोग सोचते हैं कि 10 दिन तक कुत्ते को ऑब्ज़र्व करेंगे, अगर वह ज़िंदा रहा तो वैक्सीन नहीं लेंगे. यह बहुत बड़ी ग़लती है. सही तरीका यह है कि काटते ही तुरंत अस्पताल जाएं और वैक्सीन शुरू करें. बाद में 10 दिन की ऑब्ज़र्वेशन के आधार पर डॉक्टर आगे का फ़ैसला ले सकते हैं.
अगर डर या अज्ञानता के कारण 2 दिन या एक हफ़्ते की देरी हो गई है, तब भी वैक्सीन लगवानी चाहिए. रेबीज़ में कोई सख़्त ‘कट-ऑफ़ टाइम’ नहीं है, लेकिन देरी जितनी ज़्यादा होगी, जोखिम उतना बढ़ जाएगा.
रेबीज़ से बचाव पूरी तरह संभव है. बच्चों को समझाएं कि वे आवारा कुत्तों को न छेड़ें और अपने पालतू जानवरों का समय पर वैक्सीनेशन कराएं. किसी भी बाइट या स्क्रैच को हल्के में न लें, क्योंकि आपकी सतर्कता ही आपकी जान बचा सकती है.