H3N2 वायरस: बुखार के बाद ज़िद्दी खांसी क्यों नहीं जा रही? जानिए एक्सपर्ट्स से
Ashlesha Thakur
क्या आपके घर में भी किसी को हफ़्तों से खांसी है? क्या बुखार उतरने के बाद भी शरीर टूट रहा है? अगर हां, तो आप अकेले नहीं हैं. फ़रवरी की शुरुआत के साथ ही अस्पतालों की ओपीडी मरीज़ों से भर गई है. लेकिन इस बार मामला सिर्फ़ साधारण सीज़नल फ़्लू का नहीं है.
डॉक्टर इसे ‘वायरल कॉकटेल’ का नाम दे रहे हैं, जहां H3N2, इन्फ़्लूएंजा बी और एडेनोवायरस एक साथ हमला बोल रहे हैं. सबसे बड़ी चिंता वह ज़िद्दी खांसी है जो 2-3 हफ़्तों तक जाने का नाम नहीं ले रही.
इस विशेष रिपोर्ट में, हमने डॉ. मनीषा अरोड़ा (डायरेक्टर – इंटरनल मेडिसिन, सीके बिरला हॉस्पिटल, दिल्ली) और डॉ. नमिता जग्गी (चेयरपर्सन – लैब सर्विसेज़ और इन्फ़ेक्शन कंट्रोल, आर्टेमिस हॉस्पिटल्स) से बात की. जानिए इस बार का फ़्लू पिछले सालों से कितना अलग है, क्या हैं H3N2 वायरस के लक्षण, एंटीबायोटिक्स क्यों काम नहीं कर रहीं और आपको कब अस्पताल भागना चाहिए.
इस बार का फ़्लू ‘नॉर्मल’ क्यों नहीं है?
अक्सर फ़्लू का बुखार 3-4 दिन में ठीक हो जाता है, लेकिन इस बार H3N2 का पैटर्न थोड़ा परेशान करने वाला है. जानते हैं क्यों इस बार H3N2 वायरस के लक्षण पहले की तरह नहीं हैं?
डॉ. मनीषा अरोड़ा बताती हैं कि इस बार सबसे बड़ा फ़र्क बीमारी की अवधि में है. “मरीज़ 5–7 दिन तक तेज़ बुखार, शरीर दर्द, ठंड लगना और अत्यधिक थकान की शिकायत लेकर आ रहे हैं. बुखार दवा से धीरे-धीरे उतरता है, लेकिन असली समस्या गले में जलन, सीने में भारीपन और सूखी या सफ़ेद बलगम वाली खांसी है, जो काफ़ी समय तक बनी रहती है. कई लोगों में सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज़ भी सुनाई दे रही है.”
बुखार गया, पर खांसी क्यों रह गई?
बहुत से मरीज़ शिकायत कर रहे हैं कि वे ठीक तो हो गए हैं, लेकिन खांसी उनका पीछा नहीं छोड़ रही. आख़िर इस वायरस में ऐसा क्या है?
डॉ. अरोड़ा समझाती हैं कि यह ‘पोस्ट-वायरल ब्रोंकाइटिस’ है. “यह वायरस नाक, गले और ब्रॉन्कियल ट्यूब्स की अंदरूनी परत को छील देता है. इससे एयरवे यानी सांस की नली बहुत संवेदनशील हो जाती है. बुखार ठीक होने के बाद भी ठंडी हवा, धूल या ज़्यादा बात करने भर से खांसी शुरू हो जाती है.”
डॉ. अरोड़ा कहती हैं कि अगर बलगम का रंग पीला या हरा हो जाए, सांस फूलने लगे या बुखार दोबारा आ जाए, तो यह निमोनिया का संकेत हो सकता है. ऐसे में तुरंत डॉक्टर को दिखाएं.
खतरा सिर्फ़ बुजुर्गों को नहीं: रेड फ़्लैग्स पहचानें
यह धारणा ग़लत है कि फ़्लू सिर्फ़ बच्चों या बुजुर्गों को गंभीर रूप से बीमार करता है.
डॉ. अरोड़ा के अनुसार: “युवा लोग और पहले से डायबिटीज़, दिल की बीमारी या अस्थमा वाले मरीज़ भी इस बार गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं.”
तुरंत अस्पताल कब जाएं?:
- बुखार के साथ शरीर पर चकत्ते आना.
- मरीज़ का कुछ भी खा-पी न पाना.
- बहुत ज़्यादा कमज़ोरी या डिहाइड्रेशन.
- कन्फ़्यूज़न या होश में न रहना.
- ऑक्सीजन लेवल गिरना.
वायरल कॉकटेल: जब दो दुश्मन एक साथ मिल जाएं
डॉ. नमिता जग्गी एक और चिंताजनक ट्रेंड की ओर इशारा करती हैं और वो है को-इन्फ़ेक्शन.
“आजकल H3N2, फ़्लू बी और एडेनोवायरस एक साथ फैल रहे हैं. इसे हम ‘वायरल कॉकटेल’ कहते हैं. कभी-कभी एक ही मरीज़ को एक साथ दो वायरस का इन्फ़ेक्शन हो जाता है. ऐसे मामलों में बुखार ज़्यादा तेज़ होता है और बीमारी लंबी खिंचती है. H3N2 वायरस के लक्षण पर नज़र रखें.“
चूंकि इन सभी के लक्षण (बुखार, खांसी, गले में खराश) एक जैसे हैं, इसलिए बिना टेस्ट के यह बताना मुश्किल होता है कि आपको कौन सा वायरस है. हल्के मामलों में डॉक्टर लक्षणों के आधार पर इलाज करते हैं, लेकिन गंभीर मामलों में आरटी-पीसीआर या वायरल पैनल टेस्ट ज़रूरी हो जाता है.
बच्चे क्यों हो रहे हैं सबसे ज़्यादा शिकार?
बच्चों के अस्पतालों में हालात और भी ख़राब हैं. ओपीडी में 50% से ज़्यादा केस फ़्लू वाले बच्चों के हैं.
डॉ. जग्गी इसका कारण इम्यूनिटी गैप मानती हैं. “पिछले कुछ सालों में मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग की वजह से बच्चों का सामान्य वायरस से संपर्क कम रहा, जिससे उनकी नेचुरल इम्युनिटी उतनी मज़बूत नहीं बन पाई. अब जब सब कुछ खुल गया है, तो स्कूल और डे-केयर में वायरस तेज़ी से फैल रहा है.”
अभिभावकों के लिए सलाह है कि अगर बच्चे को सुस्ती हो, सांस लेने में दिक्कत हो या लगातार बुखार रहे, तो उसे स्कूल न भेजें और डॉक्टर को दिखाएं. बच्चों में H3N2 वायरस के लक्षण समय पर पहचानें.
एंटीबायोटिक्स: दवा या जहर?
खांसी ठीक न होने पर क्या आप भी केमिस्ट से Azithromycin खरीदकर खा लेते हैं? रुकिए!
डॉ. मनीषा अरोड़ा यहां सख़्त हिदायत देती हैं: “H3N2 एक वायरल इन्फ़ेक्शन है और एंटीबायोटिक बैक्टीरिया पर काम करती है, वायरस पर नहीं. ख़ुद से एंटीबायोटिक लेने से कोई फ़ायदा नहीं होगा, उल्टा आपके शरीर में ‘एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस’ पैदा हो जाएगा और साइड इफ़ेक्ट्स अलग से होंगे.”
सही इलाज क्या है?
- खूब पानी पिएं.
- बुखार के लिए पैरासिटामोल लें.
- डॉक्टर की सलाह पर इनहेलर या कफ़ सिरप लें.
- भाप लें.
क्या अब भी वैक्सीन लगवाने का फ़ायदा है?
फ़रवरी का महीना चल रहा है, क्या अब फ़्लू वैक्सीन लगवाना चाहिए?
डॉ. नमिता जग्गी का जवाब ‘हां’ है. “अगर फ़्लू का सीज़न चल रहा है, तो अभी वैक्सीन लगवाने से फ़ायदा हो सकता है. शरीर में एंटीबॉडी बनने में दो हफ़्ते लगते हैं. यह वैक्सीन 100% सुरक्षा नहीं देती, लेकिन यह बीमारी की गंभीरता को कम कर देती है और आपको अस्पताल जाने से बचा सकती है.”
नो-मास्क के ज़माने में कैसे बचें?
मास्क अब हमारे चेहरों से गायब हो चुके हैं, लेकिन वायरस हवा में है. डॉ. अरोड़ा और डॉ. जग्गी दोनों की सलाह है कि भीड़-भाड़ वाली जगहों जैसे मेट्रो, बस, बाज़ार में मास्क को दोबारा दोस्त बना लें.
- हाथ धोएं: बार-बार हाथ सैनिटाइज़ करें.
- चेहरा न छुएं: वायरस नाक और मुंह के ज़रिए ही शरीर में घुसता है.
- इम्यूनिटी: अच्छी नींद और संतुलित आहार ही आपकी असली ढाल है.
यह H3N2 लहर डराने के लिए नहीं, बल्कि हमें सतर्क करने के लिए है. ज़िद्दी खांसी और लंबा बुखार परेशान ज़रूर कर सकता है, लेकिन सही जानकारी और सतर्कता से इसे हराया जा सकता है. एंटीबायोटिक्स का दुरुपयोग न करें और अपने डॉक्टर पर भरोसा रखें.