• Zindagi With Richa
  • 06 November, 2026
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चैत्र से कार्तिक: हिंदू पंचांग के व्रत-त्योहार और उनका महत्व

Sunita Thatte

हिंदू पंचांग के अनुसार सभी महीनों की कुछ न कुछ विशेष बात होती है. हमारे त्योहार केवल उत्सव नहीं हैं, बल्कि वे ऋतुओं, कृषि और पौराणिक कथाओं के साथ गहराई से जुड़े हुए हैं. आइए चैत्र से लेकर कार्तिक मास तक की इस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक यात्रा के महत्व को विस्तार से समझते हैं.

चैत्र से भाद्रपद: वसंत से लेकर मानसून तक के उत्सव

  • चैत्र मास: यह महीना वसंत के स्वागत के साथ शक्ति की आराधना (नवरात्रि) और श्रीराम के जन्म के उत्सव (रामनवमी) के रूप में मनाया जाता है.

  • वैशाख मास: यह महीना अपनी ‘अक्षय तृतीया’ के लिए विशिष्ट माना जाता है. शुभ संयोगों के कारण अक्षय तृतीया को पंचांग के साढ़े तीन शुभ मुहूर्तों में से एक पूर्ण शुभ तिथि माना गया है.

  • ज्येष्ठ मास: प्रचंड उष्णता वाले इस महीने में एक गुप्त नवरात्रि आती है, जिसमें गंगा दशहरा, वट अमावस्या और वट पूर्णिमा का संयोग बनता है. गंगा दशहरा के दिन ही गंगा की शीतल और अविरल धारा ने पृथ्वी को सिंचित किया था. वट पूर्णिमा सती सावित्री की कथा से जुड़ी है, जिसने अपने चातुर्य और सत्यत्व से पति के प्राणों को यमराज से वापस पाया और ससुर का खोया हुआ साम्राज्य भी लौटाया.

  • आषाढ़ मास: ग्रीष्म से वर्षा की फुहारों की ओर बढ़ता यह महीना भगवान विष्णु (विठ्ठल या जगन्नाथ) को समर्पित है. आषाढ़ी एकादशी (देवशयनी एकादशी) को विष्णु भगवान योगनिद्रा में चले जाते हैं और माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण को निकलती हैं. महाराष्ट्र में उनके स्वागत के लिए आषाढ़ अमावस्या को ‘दीप अमावस्या’ के रूप में मनाया जाता है, जहां घर के सभी दीप स्वच्छ कर प्रज्वलित किए जाते हैं.

  • श्रावण मास: यह पूर्णतः महादेव को समर्पित है. इसमें चारों सोमवार के व्रत और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व है.

  • भाद्रपद मास: श्री गणेश के आगमन से लेकर अनंत चतुर्दशी तक आनंद का वातावरण रहता है और फिर पितरों के तर्पण के साथ यह मास समाप्त होता है.

आश्विन मास: शक्ति आराधना और अमृत वर्षा (कोजागिरी पूर्णिमा)

आश्विन का आगमन शक्ति की आराधना (शारदीय नवरात्रि) और प्रभु राम की रावण पर विजय (दशहरा) के साथ होता है. इसी मास में शरद पूर्णिमा भी आती है, जब चंद्रमा अमृत वर्षा करता है.

धवल चांदनी और शीतलता के बीच, महाराष्ट्र में परिवार के सबसे बड़े बच्चे की आरती उतारी जाती है और महिलाओं को हल्दी-कुमकुम के लिए आमंत्रित किया जाता है. इस अवसर पर पांच श्वेत वस्तुएं—कच्चा सिंघाड़ा, बताशे, ताज़ा नारियल और मेवा डला गुनगुना दूध—खिलाई जाती हैं. स्वास्थ्य की दृष्टि से आश्विन मास की उमस और पित्त को शांत करने के लिए यह आहार बेहद सुखद होता है. इस ‘कोजागिरी पूर्णिमा’ को संगीत गोष्ठी और आनंद के साथ मनाया जाता है.

कार्तिक मास और 5 दिवसीय दीपावली पर्व

करवा चौथ के पर्व के साथ कार्तिक मास का आरंभ होता है. इसी महीने में भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागृत होते हैं और वर्ष का सबसे बड़ा पर्व ‘दीपावली’ मनाया जाता है.

1. धनतेरस (त्रयोदशी)

समुद्र मंथन से स्वास्थ्य के देवता भगवान धन्वंतरि, धन की देवी माता लक्ष्मी और कुबेर इसी दिन प्रकट हुए थे. अतः इन देवताओं के स्वागत में दीप प्रज्वलित कर दीपोत्सव की शुरुआत की जाती है.

2. नरक चतुर्दशी (रूप चौदस) और अभ्यंग स्नान

भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर बंदी स्त्रियों को मुक्त किया था, इसलिए दीपों और पटाखों के साथ यह दिन मनाया जाता है. इसी दिन हनुमान जी की जयंती भी मनाई जाती है (वैसे हनुमान जयंती चैत्र पूर्णिमा को भी होती है).

नरक चतुर्दशी को सूर्योदय से पूर्व ‘अभ्यंग स्नान’ की परंपरा है, जिसमें उबटन और सुगंधित तेल लगाकर गुनगुने जल से स्नान किया जाता है. महाराष्ट्र में, घर के देवघर में पीढ़ा रखकर, नीचे रंगोली सजाई जाती है और दीपक प्रज्वलित करके मंगलमय वातावरण में यह स्नान कराया जाता है. किसी भी बड़ी पूजा में बैठने से पहले अभ्यंग स्नान को शास्त्रों में शुभ माना गया है.

3. दीपावली और लक्ष्मी पूजन

शाम के समय स्थिर लग्न में लक्ष्मी पूजन होता है. द्वार पर सुंदर रंगोली सजाकर माता लक्ष्मी का स्वागत किया जाता है. भारतीय पर्व कृषि से भी जुड़े हैं. इस समय धान, मूंगफली और मक्का की फ़सल आती है. अतः पूजा में धान की लच्छी, पोहा, मक्का की लाई और बताशे अवश्य रखे जाते हैं और प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं.

4. गोवर्धन पूजा और बलि प्रतिपदा

दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा (छप्पन भोग के साथ) होती है. इसी दिन को ‘बलि प्रतिपदा’ भी कहते हैं, जिसे साढ़े तीन शुभ मुहूर्तों में गिना गया है. गुजरात में इसी दिन से नया साल शुरू होता है. कथा के अनुसार, असुरों का दानी राजा बलि जब यज्ञ कर रहा था, तब देवराज इंद्र की गद्दी बचाने के लिए भगवान विष्णु ने बौने ब्राह्मण ‘वामन अवतार’ का रूप लिया. वामन ने दान में तीन कदम भूमि मांगी. असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने उन्हें पहचान लिया और दान के जलपात्र की नलिका में बैठ गए. बलि ने सींक से छेद कर जल निकाला, जिससे शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई. संकल्प पूरा होते ही वामन ने एक कदम में पृथ्वी और दूसरे में स्वर्ग नाप लिया. तीसरा कदम रखने के लिए बलि ने अपना सिर आगे कर दिया, जिससे वह पाताल का राजा बन गया. भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि पृथ्वी लोक पर इस दिन को शुभ मुहूर्त के रूप में मनाया जाएगा.

5. भाई दूज (यम द्वितीया)

सूर्य पुत्र यम और पुत्री यमुना की इस कथा में यमुना ने अपने भाई को आमंत्रित कर भोजन कराया, टीका लगाया और आरती उतारी. यम के मार्ग में दीप प्रज्वलित करने से दीर्घायु प्राप्त होती है. जिनके भाई नहीं होते, वे दूज के दिन चंद्रमा को भाई मानकर आरती उतारती हैं.

कार्तिक मास की पूर्णता: देवउठान एकादशी और प्राकृतिक सजावट

दीपावली के बाद ‘देवउठान’ या ‘प्रबोधिनी एकादशी’ आती है, जब विष्णु जी योगनिद्रा से जागते हैं. पंढरपुर में विठ्ठल भगवान के जागने का भारी उत्सव होता है और डंका बजता है. इसके बाद कार्तिक पूर्णिमा को वाराणसी के घाटों पर असंख्य दीप जलाकर देवताओं का स्वागत होता है.

त्योहारों पर गांवों में कच्चे घरों को गोबर से लीपकर प्राकृतिक रंगों से भित्तिचित्र बनाए जाते हैं. प्रवेश द्वार पर गेरू से लीपकर चूने से चौक पूरा जाता है. गाय का गोबर शुद्ध होता है, गेरू स्वास्थ्य के लिए अच्छा है और चूना एक प्राकृतिक कीटाणुनाशक है. यह प्राकृतिक सजावट भारतीय संस्कृति की एक अद्वितीय पहचान है. कार्तिक मास की पूर्णता केवल यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विठ्ठल के श्रृंगार, आरती, स्नान और दीप प्रज्वलन जैसी अनेक घटनाओं से जुड़ी है, जिसका विस्तार अगली बार.

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