• Zindagi With Richa
  • 15 March, 2026
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Ashlesha Thakur

कुछ सालों पहले तक यह आम धारणा थी कि किडनी से जुड़ी बीमारियां सिर्फ़ ढलती उम्र का हिस्सा हैं. मगर आज अस्पतालों के डायलिसिस वॉर्ड की सच्चाई बेहद डराने वाली है. बाहर से एकदम फ़िट और तंदुरुस्त नज़र आने वाले 30 से 40 साल के युवा भी अब तेज़ी से क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ (CKD) और किडनी फ़ेलियर का शिकार हो रहे हैं.

आख़िर ऐसा क्या हुआ है कि युवाओं की किडनी उम्र से पहले ही दम तोड़ रही है? क्या हमारा जिम कल्चर, डेस्क जॉब या छोटी-छोटी बातों पर पेनकिलर खाने की आदत हमें अंदर ही अंदर खोखला कर रही है?

युवाओं में किडनी फ़ेलियर जैसे गंभीर विषय पर हमने दो एक्सपर्ट- डॉ. विक्रम कालरा (कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजी, सीके बिरला हॉस्पिटल) और डॉ. वरुण मित्तल (हेड – किडनी ट्रांसप्लांट, आर्टेमिस हॉस्पिटल्स) से विस्तार से बात की. आइए जानते हैं वो छिपे हुए कारण जिन्हें हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.

ईज़ी लाइफ़ और तनाव: नया पब्लिक हेल्थ क्राइसिस

युवाओं में किडनी फ़ेलियर का सबसे बड़ा कारण आज की भागदौड़ भरी, लेकिन शारीरिक रूप से सुस्त लाइफ़स्टाइल है.

डॉ. वरुण मित्तल इसे ‘ईज़ी लाइफ़’ का साइड इफ़ेक्ट मानते हैं. वे बताते हैं, “युवाओं में जंक फ़ूड, प्रोसेस्ड खाना, जिसमें नमक, चीनी और ट्रांस-फ़ैट बहुत ज़्यादा होता है, मोटापे और हाई बीपी का ख़तरा बढ़ा रहा है. इसके साथ ही शारीरिक गतिविधि की कमी और लगातार कॉर्पोरेट स्ट्रेस शरीर के मेटाबॉलिज़्म को पूरी तरह बिगाड़ देते हैं.”

वहीं डॉ. विक्रम कालरा कहते हैं कि यह एक नए ‘पब्लिक हेल्थ क्राइसिस’ का रूप ले रहा है. युवाओं में नींद की कमी, अनियमित खान-पान और अनियंत्रित डायबिटीज़ धीरे-धीरे किडनी को डैमेज कर रहे हैं. अगर यह ट्रेंड ऐसे ही चलता रहा, तो आने वाले समय में यह एक बड़ी चुनौती बन जाएगा.

साइलेंट डैमेज: जब तक पता चलता है, 70% किडनी हो चुकी होती है ख़राब

किडनी की सबसे ख़तरनाक बात यह है कि यह एक ‘साइलेंट ऑर्गन’ है. दोनों विशेषज्ञ इस बात पर सहमति जताते हैं कि किडनी 60-70% डैमेज होने तक कोई बड़े लक्षण नहीं दिखाती.

हम अक्सर शुरुआती ‘वॉर्निंग साइन’ को सामान्य थकान समझकर टाल देते हैं. आपको किन लक्षणों पर तुरंत ध्यान देना चाहिए?

  • लगातार बिना वजह थकान रहना.
  • पैरों के टखनों या आंखों के नीचे हल्की सूजन आना.
  • रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना.
  • पेशाब में झाग आना (यह प्रोटीन लीक होने का संकेत है).
  • अचानक भूख कम लगना या ध्यान लगाने में दिक्कत होना.

अगर ये संकेत दिखें, तो इसे सिर्फ़ काम का तनाव या नींद की कमी न समझें, तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

जिम का क्रेज़: हैवी प्रोटीन और सप्लिमेंट्स का ख़तरा

आजकल युवाओं में बॉडी बिल्डिंग का ज़बरदस्त क्रेज़ है. लेकिन जल्दी रिज़ल्ट पाने के चक्कर में वे बिना किसी डॉक्टरी सलाह के हैवी प्रोटीन पाउडर और क्रिएटिन (Creatine) लेने लगते हैं.

डॉ. कालरा समझाते हैं: “सामान्य मात्रा में प्रोटीन सुरक्षित है, लेकिन बहुत ज़्यादा प्रोटीन लेने से किडनी को उसे फ़िल्टर करने के लिए अपनी क्षमता से ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है. कुछ सप्लिमेंट्स में मिलावट या एडिटिव्स होते हैं जो किडनी के लिए ज़हर का काम करते हैं.”

डॉ. मित्तल चेतावनी देते हैं कि अक्सर युवा जिम ट्रेनर की बात सुनकर सप्लिमेंट्स लेते हैं, जो सही नहीं है. अगर आपको पहले से ही ब्लड प्रेशर या डिहाइड्रेशन की समस्या है, तो यह आपकी किडनी को हमेशा के लिए डैमेज कर सकता है. ये आदत युवाओं में किडनी फ़ेलियर का एक प्रमुख कारण बन जाता है.

पेनकिलर्स की आदत: थोड़ा सा दर्द और एक गोली

युवाओं में दर्द सहने की क्षमता कम हो गई है. हल्का सा सिरदर्द या स्ट्रेस हुआ नहीं, कि तुरंत पेनकिलर (NSAIDs) खा लिया.

विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार पेनकिलर खाने की यह आदत किडनी के फ़िल्टर को अंदर ही अंदर कमज़ोर कर रही है. डॉ. वरुण मित्तल बताते हैं, “लंबे समय तक पेनकिलर लेने से किडनी में ब्लड फ़्लो कम हो जाता है. शुरुआत में कोई लक्षण नहीं दिखता, लेकिन समय के साथ किडनी फ़ंक्शन तेज़ी से गिर सकता है.” इसलिए पेनकिलर को रोज़ाना की टॉफ़ी या रूटीन दवा की तरह लेना बंद करें.

क्रिएटिनिन का भ्रम और सही टेस्ट

ज़्यादातर युवा अपने रूटीन ब्लड टेस्ट में क्रिएटिनिन का लेवल नॉर्मल देखकर खुश हो जाते हैं कि उनकी किडनी बिलकुल स्वस्थ है. लेकिन क्या यह सच है?

विशेषज्ञों के अनुसार, किडनी डैमेज शुरू होने के बावजूद ब्लड में क्रिएटिनिन सामान्य आ सकता है. इसलिए 30 साल के बाद सिर्फ़ क्रिएटिनिन पर निर्भर न रहें. किडनी की सही स्थिति जानने के लिए ये टेस्ट ज़रूर कराएं:

  • eGFR (Estimated Glomerular Filtration Rate)
  • Urine ACR (एल्ब्यूमिन-टू-क्रिएटिनिन रेशियो)
  • सामान्य यूरिन टेस्ट (प्रोटीन लीकेज जांचने के लिए)

हाइड्रेशन का मिथक: क्या 5 लीटर पानी पीना ज़रूरी है?

सोशल मीडिया पर अक्सर बताया जाता है कि दिन में 4-5 लीटर पानी पीने से किडनी हमेशा डिटॉक्स रहती है.

डॉ. कालरा और डॉ. मित्तल दोनों इसे एक मिथक मानते हैं. ज़रूरत से ज़्यादा पानी पीना शरीर के इलेक्ट्रोलाइट संतुलन को बिगाड़ सकता है. अगर आपकी डेस्क जॉब है, तो दिन भर में 2 से 3 लीटर पानी पर्याप्त है. सबसे अच्छा नियम यही है, प्यास लगे तो पानी पिएं.

आज ही करें ये 3 बड़े बदलाव

कुर्सी पर बैठकर काम करने वाले युवाओं के लिए विशेषज्ञों ने ये 3 सबसे ज़रूरी लाइफ़स्टाइल बदलाव बताए हैं:

  1. 30 मिनट की एक्टिविटी: रोज़ाना कम से कम 30 मिनट तेज़ चलें (Brisk walk), योग करें या साइक्लिंग करें. इससे वज़न और ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहेगा.
  2. सफ़ेद ज़हर से दूरी: अपने खाने में नमक, चीनी और प्रोसेस्ड फ़ूड की मात्रा तुरंत कम करें.
  3. नियमित चेकअप और बचाव: बिना डॉक्टर से पूछे दवाएं या सप्लिमेंट्स न लें. साल में एक बार अपना बीपी, शुगर और किडनी टेस्ट (eGFR, ACR) ज़रूर कराएं.

किडनी की बीमारी रातों-रात नहीं होती. यह हमारी अपनी बनाई हुई ग़लत आदतों का नतीजा है. आज ही अपनी लाइफ़स्टाइल सुधारें, क्योंकि ईज़ी लाइफ़ के चक्कर में कहीं आपकी किडनी की लाइफ़ न कम हो जाए.

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