गणगौर पूजा में हल्दी-कुमकुम का होता है ख़ास महत्व
Zindagi With Richa
लेखिका- सुनीता थत्ते
भारतीय शादियों में रस्मों-रिवाज़ का एक बहुत ही ख़ास और गहरा महत्व होता है. अगर हम बात करें मराठी परिवार की, तो वहां बेटी के विवाह के अवसर पर ‘गौर’ (गौरी माता) को पूजने की एक बेहद सुंदर प्रथा है.
जब तक दूल्हा बारात के साथ द्वार पर नहीं आता, तब तक दुल्हन गौरी माता की प्रार्थना में मग्न रहती है. अब कोई भी यही कहेगा कि देवी की पूजा तो सभी के यहां होती है, परंतु मराठी विवाह में इसका जो विशेष और तार्किक महत्व है, वह अपने-आप में बहुत अनूठा है. आइए इस प्राचीन और सुखद परंपरा के पीछे की कहानी को समझते हैं.
नववधू का पीला शृंगार और गौर पूजा
मराठी परंपरा के अनुसार, हल्दी लगने के बाद वधू को पीली साड़ी पहनाई जाती है. इस समय उसे किसी भारी और बाहरी शृंगार की आवश्यकता ही नहीं होती, क्योंकि उसका खिलता यौवन और नववधू का आवरण ही उसे वह आभा प्रदान करता है, जो उसे सबसे सुंदर बनाता है.
फिर उसे उस कमरे में बिठा दिया जाता है जहां विवाह के लिए दिया जाने वाला सारा सामान रखा होता है. वहां एक चंदन घिसने वाले पाटे पर ‘गौर’ रखी होती हैं. वधू उसकी पूजा करती है और पुजारी उसे एक माला देते हैं, जो जयमाला के समय उसे वर को पहनानी होती है. वधू इसी गौर की पूजा करते हुए बारात के साथ आने वाले अपने वर की प्रतीक्षा करती है.
गौर-बालकृष्ण: विदाई का सबसे अनमोल उपहार
इस गौर के साथ एक ‘लड्डू गोपाल’ (बालकृष्ण) भी रखे होते हैं. विवाह के बाद विदा करते समय, लड्डू गोपाल वर की जेब में डाल दिए जाते हैं और गौर वधू के साथ विदा की जाती है.
यह गौर कोई साधारण मूर्ति नहीं होती, उनके हाथ में एक कलछी (चम्मच) होती है. मराठी परिवारों में अपनी सामर्थ्य के अनुसार माता-पिता सोने, चांदी या पीतल के ये ‘गौर-बालकृष्ण’ अपनी बेटी को मायके से देते हैं. महाराष्ट्र में सुनार की हर दुकान में यह जोड़ा तैयार मिल जाता है.
क्या है इसका असली अर्थ? आप सभी को यह उत्सुकता ज़रूर होगी कि गौरा के साथ कृष्ण का क्या संबंध है? दरअसल, यह गौर जो दी जाती है, वह साक्षात ‘अन्नपूर्णा’ का प्रतीक है. इसका अर्थ है कि वधू अपनी ससुराल में अन्नपूर्णा बनकर रहे और उसके घर में कभी अन्न-धन की कमी न हो. वहीं, उसके पति को बालकृष्ण इसलिए दिए जाते हैं ताकि उनका घर बच्चों की किलकारियों से हमेशा हरा-भरा रहे. सुखी वैवाहिक जीवन के लिए यह कितने बड़े और गहरे उपहार हैं, यह वही समझ सकता है जिसे इसका अनुभव हो.
माता अन्नपूर्णा के बनने की रोचक कथा
पार्वती जी के अन्नपूर्णा बनने की कथा भी बहुत तार्किक और रोचक है.
एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के बीच एक गहरा संवाद चल रहा था. शिव ने वैराग्य का पक्ष लेते हुए अन्य सांसारिक प्रथाओं को नकार दिया. पार्वती ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, “स्वामी! ऐसा कैसे हो सकता है? यदि यह संसार, उसकी वस्तुएं सब कुछ व्यर्थ है, तो इनका होना ही अनावश्यक है.” शिव ने उत्तर दिया, “बिलकुल, इनकी कोई आवश्यकता नहीं. मनुष्य को केवल ब्रह्म (मोक्ष) की आवश्यकता है. पृथ्वी पर अन्य सब कुछ नगण्य है.”
उनकी इस बात पर पार्वती को तनिक क्रोध आ गया. उन्हें लगा कि उनके द्वारा किए जा रहे भरण-पोषण का कोई अस्तित्व ही नहीं है? उन्होंने अपना कार्य त्याग दिया. देखते ही देखते पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया और प्राणी भूख से तड़पने लगे. अंततः शिव को भी अन्न की कमी महसूस हुई और वे भिक्षा मांगने पार्वती के पास गए और बोले, “देवी भिक्षाम् देहि!”
पार्वती ने मुस्कुराकर पूछा, “भिक्षा में क्या-क्या दूं? केवल ब्रह्म ज्ञान?” तब शिव की मुद्रा भंग हुई. उन्हें यह ज्ञान हुआ कि सृष्टि को चलायमान रखने के लिए अन्न अत्यंत आवश्यक है और अन्न के बिना ब्रह्म की प्राप्ति भी नहीं हो सकती. उन्होंने पार्वती से प्रार्थना की, “देवी, आप अन्नपूर्णा हो और आपके अन्न से पोषित हुए बिना यह सृष्टि निरर्थक है.” तभी उनके हाथों में अन्न परोसने की कलछी दी गई और माता पार्वती ने अन्नपूर्णा बनकर पूरी सृष्टि को पोषित किया. वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर के बगल में ही माता अन्नपूर्णा का मंदिर है, जहां आज भी हर घंटे अन्नछत्र चलता रहता है.
गणगौर पूजा: अखंड सौभाग्य और समृद्धि का उत्सव
यही अन्नपूर्णा गौरी, जो विवाह के समय बेटी को दी जाती है, चैत्र मास (वसंत ऋतु) में एक भव्य उत्सव का केंद्र बन जाती है. गुढ़ी पाड़वा के बाद आने वाली चैत्र शुक्ल तृतीया को महाराष्ट्र और देश के कई अन्य हिस्सों में ‘गणगौर’ (Gangaur) के रूप में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है. ‘गण’ का अर्थ है भगवान शिव और ‘गौर’ का अर्थ है माता गौरी (पार्वती).
कैसे होती है गणगौर की विशेष पूजा? मराठी परिवारों में इस दिन नवविवाहित वधू और अन्य सुहागिन महिलाएं अपनी उसी ‘गौरा’ को विशेष रूप से पूजती हैं.
- हिंडोला (झूला): इस दिन गौरा को एक सुंदर सजे हुए झूले (हिंडोले) में बैठाया जाता है.
- पंचामृत स्नान और शृंगार: माता को पंचामृत से स्नान कराया जाता है और नए वस्त्रों व आभूषणों से उनका मनमोहक शृंगार किया जाता है.
- हल्दी-कुमकुम की रस्म: गणगौर के इसी पावन दिन से महाराष्ट्र में पूरे एक महीने तक चलने वाला ‘हल्दी-कुमकुम’ (Haldi-Kumkum) का पारंपरिक कार्यक्रम शुरू होता है.
इस उत्सव में आस-पड़ोस की सुहागिन महिलाओं को घर आमंत्रित किया जाता है. उनके माथे पर हल्दी और कुमकुम लगाया जाता है, जो अखंड सौभाग्य का प्रतीक है. इसके बाद भीगे हुए चने से उनकी गोद भरी जाती है और प्रसाद के रूप में गुझिया, चने की दाल के ख़ास व्यंजन और फल खिलाए जाते हैं.
गणगौर पूजा केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि यह माता अन्नपूर्णा (गौरी) से अपने घर-परिवार के लिए सुख, शांति, पति की लंबी आयु और बच्चों की खुशहाली मांगने का एक पवित्र अवसर है.
हमारी परंपराएं महज़ कर्मकांड नहीं हैं. इनके पीछे एक पूरा जीवन दर्शन छिपा है. बेटी को विदाई में दिया जाने वाला यह ‘गौर-बालकृष्ण’ का जोड़ा और हर वर्ष होने वाली गणगौर पूजा इस बात का प्रतीक है कि एक सुखी परिवार की नींव अन्न (पोषण), प्रेम (संतान) और अखंड सौभाग्य पर ही टिकी होती है.