विट्ठलपंत और रुक्मिणीबाई: संत ज्ञानेश्वर के माता-पिता का त्याग
Sunita Thatte
महाराष्ट्र के आपेगांव में कुलकर्णी परिवार में विट्ठलपंत और रुक्मिणीबाई की इस ऐतिहासिक कथा का आरंभ होता है. उनका युवा पुत्र विट्ठलपंत, अत्यंत सद्गुणी और सदाचारी था. सदैव ईश्वर-चिंतन में रत उसकी दिनचर्या पूर्णतया ईश्वर को समर्पित थी. गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने की उसकी अवस्था आ चुकी थी, परंतु वह संपूर्ण वैरागी था. अतः माता-पिता ने भी उस पर कोई दबाव नहीं डाला.
बचपन में ही उन्होंने शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था. बुद्धि का तेज़ उनके मुखमंडल पर विलसित था. उनकी प्रतिमा अलौकिक थी. उन्होंने माता-पिता से दक्षिण यात्रा करने की इच्छा जताई. तीर्थयात्रा करने की आज्ञा पाकर वे घर से निकल पड़े.
सर्वप्रथम इंद्रायणी तट पर आलंदी नामक स्थान पर एक धर्मशाला में रुके. रोज़ स्नान संध्या, वेदपठन और ध्यान धारणा यही उनकी दिनचर्या थी. प्रातः काल स्नान करके ध्यानस्थ बैठे इस तेजस्वी बालयोगी को प्रत्येक व्यक्ति आदर से निहारता था. विट्ठलपंत को भी इंद्रायणी का यह मनोरम तट बहुत अच्छा लगा, इसलिए चार दिन यहीं रुककर दक्षिण की ओर प्रस्थान करने का उन्होंने निश्चय किया.
स्वप्न में ईश्वरीय आज्ञा और विवाह
ऐसे तेजस्वी युवक को देखकर गांव के कुलकर्णी सिद्धोपंत बहुत प्रभावित हुए और उसे उन्होंने अपने घर आमंत्रित किया. विट्ठलपंत भी एक सज्जन के निमंत्रण को अस्वीकार न कर सके और उनके घर चले गए. सिद्धोपंत ने उनका स्वागत किया और उनके रहने की व्यवस्था कर, दो दिन बाद सिद्धोपंत ने कहा कि मुझे ईश्वर से आज्ञा हुई है कि “मेरी पुत्री रुक्मिणीबाई का विवाह आपसे संपन्न किया जाए.” विट्ठलपंत ने उत्तर दिया, “परंतु मुझे ईश्वर से ऐसा कोई निर्देश नहीं मिला है. अतः जब तक ऐसा नहीं होता, मैं आपकी इच्छा स्वीकार नहीं कर सकता.”
आश्चर्य! इसके एक दिन बाद ही विट्ठलपंत को भी स्वप्न में ईश्वर से यही दृष्टांत हुआ कि वे रुक्मिणी से विवाह कर लें. फिर विट्ठलपंत ने देर न करते हुए सिद्धोपंत को अपने दृष्टांत के बारे में बताया और विवाह की स्वीकृति दी.
उस ज़माने में पत्र इत्यादि भेजने की कोई व्यवस्था नहीं थी. सिद्धोपंत ने धूमधाम से विवाह की संपूर्ण विधि संपन्न की. उसके बाद ही निश्चय के अनुसार विट्ठलपंत ने दक्षिण की यात्रा पर प्रस्थान किया. रुक्मिणी वहीं रह गई.
सिद्धोपंत को एक तेजस्वी, बुद्धिमान, चरित्रवान दामाद मिलने की प्रसन्नता थी. दूसरी तरफ विट्ठलपंत अभी भी उतने ही विरक्त और अनासक्त थे. तीर्थयात्रा करने से उनके मुख पर ज्ञान का तेज़ और भी प्रखर हो गया था.
कुछ दिन यात्रा करके विट्ठलपंत आलंदी लौटे. ससुर ने दामाद का बहुत आनंद से स्वागत किया. अब उन्हें अपने माता-पिता के पास जाने की जल्दी थी. अब वे अकेले नहीं थे. उनकी पत्नी रुक्मिणी भी उनके साथ थीं. सिद्धोपंत अपनी पुत्री रुक्मिणी के साथ आपेगांव आए. वहां सबका बहुत प्रसन्नता से स्वागत हुआ. फिर वे आलंदी लौट गए. इस प्रकार विट्ठलपंत और रुक्मिणीबाई का गृहस्थ जीवन शुरू हुआ.
वैराग्य और काशी प्रस्थान
आपेगांव में विट्ठलपंत के माता-पिता ऐसी सुलक्षणा बहु को पाकर बहुत प्रसन्न थे परंतु विट्ठलपंत के अनासक्त स्वभाव से चिंतित भी. सब कुछ ठीक ही चल रहा था. केवल विट्ठलपंत के गृहस्थधर्म का पालन करना एक समस्या थी. फिर भी सब कुछ काल की गति पर छोड़कर चल रहा था.
कुछ दिनों बाद विट्ठलपंत के माता-पिता का देहांत हो गया. रुक्मिणी अभी भी अपत्यहीन थी. यह दुःख उन्हें बहुत आहत कर रहा था. अपनी बेटी को देखने आए सिद्धोपंत भी बहुत दुःखी हुए और अपनी बेटी और दामाद को अपने साथ आलंदी ले आए.
आलंदी आने पर भी विट्ठलपंत की अनासक्ति में कोई अंतर नहीं आया. इस कारण रुक्मिणी सदैव दुखी और चिंतित रहती थी. एक तो संतान न होने का दुःख और दूसरी ओर पति की ओर से विरक्ति का भाव. वह अक्सर सोचती कि कहीं पति उन्हें छोड़कर चले तो न जाएंगे? क्योंकि विट्ठलपंत सदैव संन्यास ग्रहण करने की बात करते.
एक दिन वह अनमनी सी दुखी बैठी थी कि विट्ठलपंत ने उनसे कहा कि यदि वह सहमति दें तो वे संन्यास ले लें. वह भी दुखी कुछ चिड़चिड़ी सी बैठी थी. उन्होंने कहा, “हां! ले लीजिए.”
बस! इसे स्वीकारोक्ति मानकर विट्ठलपंत वहां से चले गए. थोड़ी देर में रुक्मिणीबाई सजग हुई तो पति को ढूंढने लगी.
बहुत देर तक देखा, प्रतीक्षा की परंतु वे नहीं लौटे. वह अत्यंत दुःखी हुई, लेकिन कोई चारा नहीं था उनका यही प्रारब्ध था जिसे उन्होंने स्वीकार किया और तपस्विनी की भांति रहने लगी.
प्रातः इंद्रायणी पर स्नान, नाम-स्मरण, व्रत, वैकल्प, साध्वी का जीवन स्वीकार कर मानव जीवन का उद्देश्य प्राप्त करने हेतु प्रयत्नशील हो गई. एक दिन संध्या समय मारुति मंदिर में पता चला कोई बड़े महात्मा वहां पधारे हैं. सभी उनके दर्शन हेतु जा रहे हैं. वह भी वहां गई और महात्मा के पैरों पर अपना शीश रखा. महात्मा ने आशीर्वाद दिया, “पुत्रवती भव!” वह चौंककर पीछे हट गई. महात्मा ने पूछा, “ऐसी क्या बात है देवी?” वह बोली, “यह तो असंभव है, मेरे पति मुझे छोड़कर चले गए हैं.”
स्वामी चौंक गए फिर उनसे पति के बारे में पूछा और नाम पता लगते ही उन्होंने अपनी अतींद्रिय से देखा उनका शिष्य विट्ठलपंत जिसे उन्होंने चैतन्याश्रम नाम दिया था, वही इस महिला के पति हैं. यह महात्मा अन्य कोई नहीं, काशी के रामानंद स्वामी थे.
आलंदी से निकलकर विट्ठलपंत ने सीधा काशी का मार्ग ग्रहण किया था और वे स्वामी रामानंद के पास दीक्षा लेने गए. स्वामी ने उनसे यह अवश्य पूछा था कि उनके कोई संबंधी नहीं हैं. विट्ठलपंत ने स्वीकारोक्ति में उत्तर दिया. स्वामी ने उन पर विश्वास किया और दिव्य दृष्टि से और कुछ देखने की आवश्यकता नहीं समझी. उसे दीक्षा देकर चैतन्याश्रम नाम दिया. संत कबीर के गुरु भी स्वामी रामानंद ही थे.
विट्ठलपंत और रुक्मिणीबाई का पुनः गृहस्थाश्रम और समाज का बहिष्कार
अब आशीर्वाद दिया जा चुका था. फलीभूत भी होना ही था. चैतन्यश्रम को काशी से वापस बुलाया गया और उसे वापस गृहस्थाश्रम में प्रवेश कराया गया. उन्होंने विट्ठलपंत से कहा कि “मै तुम्हारी चतुर्थ आश्रम की दीक्षा समाप्त करता हूं. तुम पुनः गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करो. यही ईश्वर की इच्छा है.”
गुरु की इच्छा से विट्ठलपंत ने पत्नी का स्वीकार कर लिया. परंतु यह आचरण ब्राह्मण वृंद को पसंद नहीं आया. उन लोगों ने इन दोनों पति पत्नी को समाजच्युत कर दिया. अतः ब्राह्मण कर्म इत्यादि में विट्ठलपंत बहिष्कृत कर दिए गए. रुक्मिणी को समाज ने स्वीकार नहीं किया.
क्या करते किसी तरह भिक्षा मांग विट्ठलपंत और रुक्मिणीबाई रहने लगे. भागवत वचन और ईश्वर के प्रति निष्ठा में कभी कोई कमी नहीं आयी. ऐसे बारह वर्ष बीत गए. पहले अनासक्ति और संतति की चाह में भी विलंब. क्या प्रारब्ध बारह वर्ष बाद उन्हें पहला पुत्र निवृत्तिनाथ हुए. कृष्ण जन्माष्टमी के दिन ज्ञानदेव इसके दो साल बाद सोपान और फिर मुक्ता.
पति-पत्नी बच्चों के जन्म से बहुत प्रसन्न थे. समाज द्वारा अस्वीकृत, फिर भी अपनी गृहस्थी में प्रसन्न थे. चारों बच्चे अपने माता-पिता के साथ कष्टकारी स्थिति में रहते थे परंतु बुद्धिमान, धैर्यशील थे. कुछ अच्छे लोग उनसे संबंध भी रखते थे. उनसे प्रेम से व्यवहार करते थे. संक्षेप में कहा जाए तो समाज से बहिष्कृत यह परिवार कष्टकारी जीवन जी रहा था परंतु ईश्वर ने उनमें इतना धैर्य दिया था कि उस दशा में भी सभी अपनी साधना में लीन रहते थे.
बच्चों के थोड़े बड़े होने पर माता-पिता को चिंता सताने लगी कि आगे इनके भविष्य का क्या होगा? नियति का खेल कैसा है जब बच्चे नहीं थे तो होने की चिंता और अब बच्चे होने पर बच्चों के भविष्य की चिंता. कोई अन्य उपाय न सूझता देखकर विट्ठलपंत और रुक्मिणीबाई दोनों ने त्र्यंबकेश्वर जाने का निश्चय किया. सोचा, प्रभु ही कोई मार्ग सुझा देंगे. त्र्यंबकेश्वर जाने पर रोज़ रात को कुशावर्त पर स्नान और ब्रह्मगिरी पर्वत की प्रदक्षिणा करने का कार्यक्रम प्रारंभ किया.
एक रात्रि को अचानक प्रदक्षिणा करते समय एक शेर की दहाड़ ने उन सबको भयभीत कर दिया और सुरक्षा हेतु इधर उधर भागने में निवृत्ति कही रास्ता भटक गए. अब सभी निवृत्ति को ढूंढने में लगे परंतु निराश होकर पुनः त्र्यंबकेश्वर वापस लौट आए.
कुछ दिनों बाद निवृत्ति वापस आया और उसने अपनी कथा माता-पिता को सुनाई. भाई-बहन भी बड़े भैया से गले मिलकर प्रसन्न हुए. कुछ दिन वहां रुककर पूरा परिवार आलंदी आया. यहां आकर विट्ठल ने सोचा निवृत्ति कि उम्र यज्ञोपवीत की हो चुकी है, अतः ब्राह्मण वृंदों से उन्होंने अनुग्रह किया कि वे निवृत्ति का यज्ञोपवीत करने की सहमति प्रदान करें. उन्होंने प्रार्थना की, “हे भूदेव गृहस्थ आश्रम स्वीकार करने के बाद इन बीस वर्षों में हमारे व्यवहार, विचार में कोई भी भूल नहीं हुई है. अतः आप हमें समाज में स्वीकार करें और मेरे पुत्र निवृत्ति का यज्ञोपवीत संस्कार करवाएं.” उनकी इस विनती का ब्राह्मण समाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. उन लोगों ने स्पष्ट रूप से कहा “आपका अपराध प्रायश्चित योग्य नहीं है. इस अपराध का एकमात्र दंड है मृत्युदंड!”
कठोर प्रायश्चित: जलसमाधि का निर्णय
यह सुनने के बाद विट्ठलपंत ने निश्चय किया यदि नियति को यही स्वीकार है तो यही करेंगे. फिर तो उन्हें जीवन से पूर्णतया अनासक्ति हो गई. अब वह प्रायश्चित करने को तत्पर हो गए. रुक्मिणी ने भी साथ जाने का निश्चय किया. एक रात दोनों अपने सोते हुए बच्चों को छोड़कर जलसमाधि के लिए निकल पड़े. इंद्रायणी का तट सूना पड़ा था. विट्ठल और रुक्मिणी अपने निश्चय से आगे बढ़ रहे थे. रुक्मिणी के नेत्रों में अश्रु थे. वह बार-बार पीछे मुड़कर देखती थी. अब एक दिव्य व्यक्ति प्रकट हुए. उन्होंने पूछा “जीवन त्यागने का दुख है?” रुक्मिणी ने उत्तर दिया “अपने जीवन का नहीं, मां हूं अपने बच्चों को कष्ट में छोड़कर जाने का दुख है.”
यह दिव्य पुरुष गहिनीनाथ थे. नवनाथ संप्रदाय के सातवें गुरु. उन्होंने गंभीर स्वर में कहा “तुम्हारे सभी बच्चे ईश्वर का अवतार हैं. त्र्यंबकेश्वर में निवृत्ति मेरे पास ही आया था. मैने उसे दीक्षा दी है. अब तुम्हें इनकी चिंता करने के कोई आवश्यकता नहीं है.”
ऐसा सुनते ही वह घर लौटी निवृत्ति को जगाया और गहिनीनाथ को प्रणाम कर बोली. मेरा यह बालक मैं आपकी शरण में छोड़कर जा रही हूं. फिर निवृत्ति से बोली “बेटा निवृत्ति! तुम्हारे भाई, बहन को अब तुम्हारे पास छोड़कर जा रही हु. इनका ध्यान रखना.
ऐसा कहकर वे दोनों अपना प्रायश्चित करने इंद्रायणी की ओर चले गए.
क्रमशः