World Book Lover’s Day: किताबों से दूर होती हमारी दुनिया
Sandhya Gupta
आज 9 अगस्त को पूरी दुनिया में ‘वर्ल्ड बुक लवर्स डे’ (World Book Lover’s Day) मनाया जा रहा है. यह दिन उन पन्नों की खुशबू और कहानियों की अनूठी दुनिया का जश्न मनाने का है, जो कहीं न कहीं हमारी मोबाइल स्क्रीन की चमक के पीछे छिपती जा रही हैं.
सुबह क्या खाया था, कई बार रात तक याद नहीं रहता. लेकिन सुबह से अब तक मोबाइल पर क्या-क्या देखा, कितनी बार स्क्रॉल किया और कितनी चीज़ों पर रुके, शायद उसका भी कोई हिसाब नहीं है. दिनभर हम कुछ न कुछ देखते, पढ़ते और सुनते रहते हैं, लेकिन रात में अगर खुद से पूछें कि आज जो कुछ देखा, उसमें से कितना याद है, तो शायद बहुत कम.
कभी सोचा है, ऐसा क्यों है?
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि लगातार स्क्रीन देखने से हमारे दिमाग़ का डोपामाइन (Dopamine) स्तर तो तेज़ी से बढ़ता है, लेकिन हमारी चीज़ों को गहराई से याद रखने की क्षमता कम हो जाती है. हम जानकारी तो बहुत ले रहे हैं, लेकिन हर जानकारी हमारे साथ रह नहीं रही. एक चीज़ देखी, दूसरी पर चले गए, फिर तीसरी. मोबाइल हमें लगातार आगे ले जाता रहता है.
किताब के साथ ऐसा नहीं है. किताब पढ़ते समय आपको रुकना पड़ता है. एक ही विषय के साथ समय बिताना पड़ता है. पढ़ना पड़ता है, समझना पड़ता है और कई बार उस पर सोचना भी पड़ता है. शायद इसी वजह से किताब से मिली कोई बात सिर्फ़ जानकारी बनकर नहीं रहती, वह हमारे सोचने का हिस्सा भी बन सकती है.
किताबों से मोबाइल तक का सफ़र
पहले किसी भी विषय के बारे में जानना होता था, तो किताबों पर निर्भर रहना पड़ता था. किसी विषय पर किताब चाहिए तो किताबों की दुकान पर जाना, अलग-अलग किताबें देखना, अलग-अलग लेखकों की किताबें देखना और फिर अपनी पसंद की किताब लेकर आना. एक ही विषय पर कई लेखकों की किताबें होती थीं और हर लेखक का अपना नज़रिया होता था.
किताबों की दुकान पर जाना भी अपने आप में एक अलग अनुभव था. हर तरफ़ किताबें होती थीं और हर किताब किसी अलग दुनिया में ले जाने वाली लगती थी. आज ई-बुक्स का ज़माना है, लेकिन कागज़ की किताबों की सोंधी महक का मुकाबला कोई स्क्रीन नहीं कर सकती.
और किताब सिर्फ़ ज्ञान के लिए नहीं थी. मनोरंजन के लिए भी किताबों की अपनी पूरी दुनिया थी. उपन्यास, प्रेम कहानियां, रोमांस, हॉरर, डार्क कॉमेडी, कॉमिक्स और बच्चों की कहानियां, हर तरह की चीज़ें किताबों में मिल जाती थीं. बच्चे कॉमिक्स पढ़ते थे, कहानियां पढ़ते थे. उपन्यासों की सीरीज़ आती थी और लोग उसकी अगली सीरीज़ का इंतज़ार करते थे. आज जिस तरह किसी वेब सीरीज़ के अगले सीज़न का इंतज़ार होता है, उस समय किताबों की अगली सीरीज़ का इंतज़ार भी कुछ ऐसा ही था.
किताब ख़त्म हो जाती थी, लेकिन कहानी ख़त्म नहीं होती थी. अब जिज्ञासा रहती थी कि अगली किताब कब आएगी और आगे क्या होगा.
स्क्रीन टाइम और घटता मानवीय जुड़ाव
आज हमारे पास मनोरंजन चौबीसों घंटे मौजूद है. मोबाइल उठाया और कुछ भी देख लिया. किसी चीज़ के बारे में जानना है तो तुरंत खोज लिया. किसी चीज़ को लेकर जिज्ञासा हुई तो उसका जवाब भी कुछ ही सेकंड में सामने है.
यह सुविधा अपनी जगह अच्छी है. इंटरनेट ने जानकारी तक पहुंचना बहुत आसान कर दिया है. लेकिन मोबाइल पर हमें अक्सर किसी विषय की जानकारी मिलती है, जबकि किताब उस विषय को समझने का मौक़ा देती है.
आज हम एक-दूसरे के सामने बैठे होते हैं और फिर भी अपने-अपने मोबाइल में लगे रहते हैं. एक-दूसरे से बात करने के बजाय अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं. तकनीकी विकास के साथ एक तरह का मानवीय जुड़ाव भी कम हुआ है.
किताब पढ़ने का सबसे बड़ा फ़ायदा: ठहराव
किसी विषय की किताब पढ़ते हुए आपको उसका एक पूरा नज़रिया मिलता है. उसकी बुनियादी जानकारी मिलती है और फिर आप उस विषय के बारे में अपनी समझ बना पाते हैं. किताब में एक ठहराव होता है.
मोबाइल पर कुछ देखा, जानकारी ली और आगे बढ़ गए. फिर दूसरी चीज़, फिर तीसरी और फिर लगातार स्क्रॉल करते चले गए. किताब पढ़ने के लिए आपको बैठना पड़ता है, ध्यान देना पड़ता है और एक-एक पंक्ति समझनी पड़ती है.
माइक्रोसॉफ्ट की एक रिसर्च के अनुसार, डिजिटल क्रांति के बाद इंसानों का अटेंशन स्पैन (ध्यान केंद्रित करने की क्षमता) घटकर महज़ 8 सेकंड रह गया है, जो एक गोल्डफिश से भी कम है. किताबें पढ़ने की आदत इस खोते हुए अटेंशन स्पैन को दोबारा वापस लाने का सबसे कारगर तरीका है. शायद किताब न पढ़ने का नुकसान सिर्फ़ यह नहीं है कि हम कम पढ़ रहे हैं, बल्कि हमारा ध्यान भी एक जगह कम टिकता जा रहा है.
भाषा पर पकड़ और रचनात्मकता
किताब पढ़ने से आपकी भाषा पर भी पकड़ बनती है. अलग-अलग लेखकों को पढ़ने से अलग-अलग तरह की भाषा, सोच और अपनी बात कहने के तरीके समझ आते हैं.
कहानियां और उपन्यास पढ़ते हुए हम सिर्फ़ कहानी नहीं पढ़ते. हम पात्रों से जुड़ते हैं, उनके भाव समझते हैं और कई बार अपनी ही कुछ भावनाओं को भी समझ पाते हैं. हमारे दिमाग़ में बहुत सारे विचार चलते रहते हैं. कोई किताब पढ़ते हुए कुछ समय के लिए हमारा ध्यान उन विचारों से बाहर आ जाता है.
किताब में एक व्यक्तिगत जुड़ाव भी होता है. एक इंसान जब किताब लिखता है, तो उसमें उसकी सोच, उसके अनुभव और उसकी रचनात्मकता होती है. इसलिए किताब पढ़ते हुए आपको सिर्फ़ जानकारी नहीं मिलती, आपको किसी दूसरे इंसान का नज़रिया भी मिलता है. किताबें आपकी रचनात्मकता को भी निखारती हैं. चित्र, कहानियां, चुटकुले या किसी लेखक का लिखने का तरीका, इन सबको पढ़ते हुए आप देखते हैं कि कोई दूसरा व्यक्ति अपनी रचनात्मकता को किस तरह इस्तेमाल कर रहा है.
किताबों से मिली कुछ अनमोल बातें
कुछ किताबें ऐसी होती हैं जिन्हें पढ़कर आप उन्हें वहीं छोड़ नहीं देते. उनकी कोई बात, कोई विचार या कोई भावना आपके साथ चलती रहती है.
शायद किताबों की यही ख़ासियत है. उनका असर हमेशा उसी समय दिखाई नहीं देता. वे धीरे-धीरे हमारे सोचने के तरीके में कहीं जगह बना लेती हैं. मोबाइल हमें जानकारी बहुत जल्दी दे सकता है. यह हमारी ज़रूरत है, हमारे काम का हिस्सा है और इससे बहुत कुछ सीखना भी संभव है. लेकिन हर चीज़ का जल्दी मिल जाना यह पक्का नहीं करता कि वह ज़्यादा देर तक हमारे साथ भी रहे.
किताब हमें थोड़ा रुकना सिखाती है. एक विषय को पूरा पढ़ना, उसे समझना, उसके बारे में सोचना और फिर अपनी राय बनाना, यह अनुभव तेज़ी से स्क्रॉल करने में नहीं मिलता.
इसलिए आज ‘वर्ल्ड बुक लवर्स डे’ पर जब भी आपको खाली समय मिले और हाथ अपने आप मोबाइल की तरफ़ जाए, तो शायद एक बार किसी पुरानी या नई किताब की तरफ़ भी हाथ बढ़ाया जा सकता है. आख़िर किताबों से बेहतर और शांत दोस्त कोई दूसरा नहीं है.